18 January 2020
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ऐसे बचेगी देश की इकोनॉमी, बजट के लिए एक्सपर्ट्स ने दीं ये सलाह

आर्थिक चुनौती से निपटने के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि मांग, खपत और निवेश को बढ़ाया जाए. अगर चुनौती है तो इसके लिए समाधान भी है. इसके लिए पांच ऐसे जरूरी कदम हैं जो बजट में उठाए जा सकते हैं.निवेश बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा कॉरपोरेट टैक्स में कटौती, बैंकों को विलय, बैंकों को नई पूंजी देने, जीएसटी रेट में कटौती और रेपो रेट में कटौती जैसे उपायों का अभी तक कुछ खास असर नहीं दिखा है. इसलिए यह साफ दिख रहा है कि वित्त मंत्री को अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए निजी निवेश पर निर्भर रहने की अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा.

सच तो यह है कि रिजर्व बैंक द्वारा अब तक करीब रेपो रेट में करीब 1.35 फीसदी की कटौती के बावजूद बैंकों के कर्ज वितरण पर खास असर नहीं हुआ है. नवंबर से मार्च 2019 के बीच बैंक कर्ज वितरण में 1 फीसदी की गिरावट आई है.इसके अलावा औद्योगिक उत्पादन में अगस्त, सितंबर और अक्टूबर 2019 में गिरावट आई है. रिजर्व बैंक के औद्योगिक आउटलुक सर्वे के अनुसार इस वित्त वर्ष यानी 2019-20 की तीसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का समूचा सेंटिमेंट निराशावादी ही है.

ये पांच कदम जरूरी
ऐसे हालात को देखते हुए मांग को बढ़ाने के लिए बजट में 5 जरूरी कदम उठाने चाहिए. तमाम सरकारी रिपोर्ट से भी यह साफ है कि निचले पायदान के गरीब लोगों के सहयोग के लिए सरकार को तत्काल कुछ कदम उठाने होंगे.

1. बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च बढ़ाना होगा
मांग बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी यह है कि बुनियादी ढांचे, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च बढ़ाया जाए. इकोनॉमिस्ट प्रोफेसर सी. रंगराजन इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि अर्थव्यवस्था में मांग पैदा करने और भविष्य के ग्रोथ का आधार तैयार करने के लिए सरकार को पूंजीगत व्यय में निवेश बढ़ाना होगा. हालांकि राजकोष की सख्त हालत और राजस्व में अपेक्षा के अनुरूप बढ़त न होने की वजह से यह थोड़ा मुश्किल भी है. अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार इस बात पर जोर देते हैं कि ग्रामीण बुनियादी ढांचे खासकर सड़कों, अस्पताल, शि‍क्षा और स्वास्थ्य पर ज्यादा निवेश जरूरी है. इसकी वजह यह है कि हाल के वर्षों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ज्यादा चोट पहुंची है.

2. न्यूनतम वेतन बढ़ाया जाए
केंद्र सरकार ने पिछले साल यानी 2019 में ही राष्ट्रीय न्यूनतम आय बढ़ाया है. लेकिन इसमें सिर्फ 2 रुपये की मामूली बढ़त की गई, इसे प्रतिदिन 176 रुपये से बढ़ाकर 178 रुपये किया गया, जबकि एक एक्सपर्ट कमिटी ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 375 रुपये प्रति दिन और शहरी कामगारों को प्रति दिन इसमें 55 रुपये का अतिरिक्त हाउस रेंट अलाउंस देने का सुझाव दिया था.

3. मनरेगा का विस्तार किया जाए
प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार योजना (MGNREGS) में मजदूरी तो बढ़ाया जाना ही चाहिए, इसमें साल में कम से कम 100 दिन रोजगार की गारंटी देनी चाहिए, जबकि अभी 45 दिन का ही औसत काम मिल पा रहा है.इकोनॉमिस्ट प्रणब सेन भी मनरेगा में मजदूरी बढ़ोतरी का समर्थन करते हैं. उन्होंने कहा कि मनरेगा एक अच्छी तरह से स्थापित कार्यक्रम है, इसलिए केंद्र सरकार को इस पर फोकस करना चाहिए.

4. भूमिहीन कृषि‍ मजदूरों को भी मिले PM किसान योजना का फायदा
पीएम किसान योजना साल 2019-20 यानी पिछले साल के बजट में शुरू की गई थी. इस योजना का लाभ छोटे एवं सीमांत किसानों को मिलता है. इसके तहत किसानों को हर साल 6,000 रुपये की रकम तीन किस्त में मिलती है. लेकिन इसमें ‘सबसे गरीब’ माने जाने वाले भूमिहीन, कृषि‍ मजदूरों को छोड़ दिया गया है जो कुल कृषि‍ कार्यबल का 55 फीसदी हिस्सा हैं. अब इस योजना से भूमिहीन, कृषि‍ मजदूरों को भी जोड़ना चाहिए और जनधन-आधार-मोबाइल पहल की सफलता से यह करना आसान भी है.

5. यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) योजना लाई जाए
पूर्व चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर अरविंद सुब्रमण्यम ने साल 2016-17 के इकोनॉमिक सर्वे में सबसे पहले यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी सार्वभौमिक बुनियादी आय (UBI) की धारणा पेश की थी. इसके पीछे सोच यह है कि हर व्यक्ति को कम से एक न्यूनतम आमदनी हो, इसकी सरकार व्यवस्था करे. इससे फायदा यह होगा कि हर आदमी गरिमा के साथ अपने जीवन की बुनियादी जरूरतों को तो पूरा कर सकता है.

इसके तहत यह प्रस्ताव रखा गया था कि 75 फीसदी आबादी को हर साल 7,620 रुपये का इनकम ट्रांसफर किया जाए. इसके लिए सालाना जीडीपी के 4.9 फीसदी रकम खर्च हो सकती है. अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, नीदरलैंड सहित करीब 100 देशों में ऐसी योजना या इसके पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं.

क्या होगा फायदा
गरीबों की जेब में ज्यादा पैसा पहुंचाने से जीडीपी ग्रोथ को भी बढ़ावा मिलेगा. आईएमएफ की साल 2015 में जारी 150 देशों की एक स्टडी में यह दिलचस्प आंकड़ा सामने आया कि अमीरों की आमदनी बढ़ने से वास्तव में जीडीपी में गिरावट आई, जबकि गरीबों की आमदनी बढ़ाने से जीडीपी ग्रोथ में तेजी आई.

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